संक्षिप्त उत्तर
रानी कैकेयी को राजा दशरथ से दो वरदान तब प्राप्त हुए जब उन्होंने असुर शम्बर के विरुद्ध हुए भीषण युद्ध में उनका प्राणरक्षण किया। कैकेयी के साहस और समर्पण से प्रसन्न होकर दशरथ ने उन्हें दो वरदान देने का वचन दिया, जिन्हें वे जब चाहें माँग सकती थीं। वर्षों बाद कैकेयी ने इन्हीं वरदानों का उपयोग भरत के राज्याभिषेक और श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास की मांग के लिए किया।
कथा
अयोध्या के राजा दशरथ को युद्ध-कौशल और पराक्रम में देवराज इंद्र के समान वीर कहा गया है। श्रीराम के जन्म से पूर्व उन्होंने देवताओं की ओर से अनेक शक्तिशाली असुरों के विरुद्ध युद्ध लड़े। ऐसा ही एक भीषण युद्ध दक्षिण भारत के दण्डकारण्य में स्थित वैजयंत नगरी में असुर शम्बर के विरुद्ध लड़ा गया, जिसकी शक्ति देवताओं के लिए एक गंभीर चुनौती बन गई थी।
कैकेयी, जो केकय देश की राजकुमारी और राजा दशरथ की सबसे छोटी रानी थीं, इस युद्ध में उनके साथ गई थीं। प्राचीन भारतीय परंपराओं में कहीं-कहीं यह उल्लेख मिलता है कि विशेष परिस्थितियों में रानियाँ भी युद्ध अभियानों में राजा के साथ रहती थीं, यद्यपि ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, राजा दशरथ ने इस युद्ध में अद्वितीय पराक्रम का प्रदर्शन किया और असुर सेना को भारी क्षति पहुँचाई। किंतु युद्ध के उग्र होने पर वे गंभीर रूप से घायल हो गए और असुरों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। वे इतने अधिक घायल हो चुके थे कि उनके लिए युद्ध जारी रखना असंभव हो गया और उनका जीवन संकट में पड़ गया। ऐसे संकटपूर्ण समय में कैकेयी ने अद्भुत साहस, धैर्य और सूझबूझ का परिचय दिया। उन्होंने कुशलतापूर्वक दशरथ का रथ शत्रु सेना के घेरे से बाहर निकाला और उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया। जब असुरों ने उनका ठिकाना खोज लिया, तब कैकेयी उन्हें एक बार फिर दूसरे सुरक्षित स्थान पर ले गईं। पूरी रात उन्होंने घायल राजा की सेवा की और उन्हें जीवित रखने के लिए हर संभव प्रयास किया।
कैकेयी के इस असाधारण साहस और निष्ठा से अभिभूत होकर राजा दशरथ ने उन्हें दो वरदान देने का वचन दिया। किंतु कैकेयी ने उस समय कोई वरदान नहीं माँगा। उन्होंने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर वे भविष्य में इन वरदानों का उपयोग करेंगी।
रामायण की उत्तरवर्ती परंपराओं में इसी युद्ध से जुड़ा एक और प्रसिद्ध प्रसंग मिलता है। इन कथाओं के अनुसार, युद्ध के दौरान दशरथ के रथ की धुरी की कील निकल गई। तब कैकेयी ने अपना हाथ धुरी में लगा दिया और रथ को तब तक संभाले रखा, जब तक उसकी मरम्मत नहीं हो गई। इससे दशरथ युद्ध जारी रख सके। यद्यपि यह प्रसंग लोकपरंपरा में अत्यंत लोकप्रिय है, वाल्मीकि रामायण के प्राचीनतम उपलब्ध पाठ में इसका उल्लेख नहीं मिलता।
वर्षों बाद जब श्रीराम के राज्याभिषेक की घोषणा हुई, तब कैकेयी की दासी मंथरा ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि यदि राम राजा बने, तो भरत का भविष्य संकट में पड़ जाएगा। भय और मोह से प्रभावित होकर कैकेयी ने वही दो वरदान माँगे: पहला, भरत का राज्याभिषेक, और दूसरा, श्रीराम का चौदह वर्षों का वनवास।
आज के समय में इसका महत्व
कैकेयी का जीवन यह सिखाता है कि किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसके एक निर्णय से नहीं होती। वे एक समय ऐसी वीरांगना थीं जिन्होंने अपने पति का जीवन बचाया, किंतु इतिहास उन्हें मुख्यतः उस निर्णय के लिए याद करता है जिसने श्रीराम के वनवास का मार्ग प्रशस्त किया।
यह प्रसंग वचनपालन के महत्व को भी दर्शाता है। अत्यंत दुख और व्यक्तिगत पीड़ा के बावजूद राजा दशरथ ने अपने दिए हुए वचन का पालन किया। इसीलिए उनका जीवन सत्य, धर्म और प्रतिज्ञा-पालन का आदर्श माना जाता है।
क्या आप जानते हैं?
- वनवास की घटना से बहुत पहले कैकेयी अपनी वीरता और युद्ध-कौशल के लिए प्रसिद्ध थीं।
- दशरथ द्वारा दिया गया यही वचन भारतीय महाकाव्यों की सबसे महत्वपूर्ण प्रतिज्ञाओं में से एक सिद्ध हुआ।
संदर्भ
- वाल्मीकि रामायण, अयोध्या काण्ड (गीता प्रेस तथा बिबेक देबरॉय के अनूदित संस्करण)।
- महाभारत, वनपर्व (रामोपाख्यान), बिबेक देबरॉय द्वारा अनूदित।
- रामचरितमानस, गोस्वामी तुलसीदास (उत्तरवर्ती भक्तिकालीन परंपरा के संदर्भ में)।