दूत उस समय पहुँचा, जब शांता अपने पिता के लिए पका हुआ आम काट रही थीं।
"अयोध्या से, राजकुमारी," उसने एक मुड़ा हुआ पत्र आगे बढ़ाते हुए कहा।
शांता ने चाकू नीचे रख दिया। आम का रस उनकी उँगलियों पर फैल गया था और पीतल की थाली के पास जमा हो गया था। बाहर आँगन में दो घोड़े अपने खुर पटक रहे थे और कोई पानी लाने के लिए पुकार रहा था।
"क्या महाराज के साथ कुछ हुआ है?" उन्होंने पूछा।
"नहीं, राजकुमारी। समाचार महारानी कौसल्या के विषय में है।"
शांता ने कपड़े से अपने हाथ पोंछे और पत्र की मुहर खोल दी।
पत्र छोटा था। महारानी कौसल्या ने एक पुत्र को जन्म दिया था। बालक का नाम राम रखा गया था।
शांता ने उन पंक्तियों को दोबारा पढ़ा।
उनके छोटे भाई का जन्म हो चुका था।
उन्हें एहसास ही नहीं हुआ कि वह काफी देर से खड़ी थीं। जब वह बैठीं, तब तक आम थाली में वैसे ही पड़ा था।
"पिताजी को यह समाचार मिलना चाहिए," उन्होंने कहा।
राजा रोमपाद पूर्वी आँगन में थे। वह सिंचाई की एक नहर के क्षतिग्रस्त होने को लेकर दो किसानों के बीच चल रहे विवाद को सुन रहे थे। उन्होंने अगले दिन सुबह लौटने का निर्देश देकर दोनों किसानों को विदा किया और शांता से पत्र ले लिया।
"आखिरकार एक पुत्र," उन्होंने मुस्कराते हुए कहा। "महाराज दशरथ बहुत प्रसन्न होंगे।"
"जी।"
रोमपाद ने उनकी ओर देखा। "और तुम?"
शांता ने मुस्कराने का प्रयास किया। "मैं भी प्रसन्न हूँ।"
उन्होंने शांता का हाथ थामने के लिए हाथ बढ़ाया, फिर उनकी उँगलियों पर आम का रस देखकर रुक गए।
"तुम्हें पत्रों को छूने से पहले हाथ धो लेना चाहिए," उन्होंने कहा।
शांता हँस पड़ीं। रोमपाद भी उनके साथ हँसने लगे। कुछ देर के लिए सब कुछ पहले जैसा सामान्य लगने लगा।
उस शाम शांता ने राम के जन्म का समाचार लेकर एक पत्र अयोध्या भेजने को कहा। उन्होंने महारानी कौसल्या और महाराज दशरथ को बधाई देने के लिए कुछ पंक्तियाँ लिखवाईं। फिर उन्होंने बालक के लिए एक पंक्ति और जोड़ दी।
तुम स्वस्थ और प्रसन्न रहो। अंग में तुम्हारी बहन तुम्हें अपना आशीर्वाद भेजती है।
वह तुम्हारी बहन शब्दों पर हिचक गईं।
"क्या यह कुछ अधिक अपनापन जताने जैसा लगेगा?" उन्होंने लेखक से पूछा।
वृद्ध लेखक ने सिर उठाया। "आप उनकी बहन ही तो हैं, राजकुमारी।"
"हाँ," उन्होंने कहा। "मैं हूँ तो।"
उन्होंने उन शब्दों को रहने देने के लिए कहा।
अंग में शांता को राजा रोमपाद की पुत्री के रूप में जाना जाता था। महल के सेवकों को पता था कि वह किन सुबहों में रसोई जाती थीं और किन दोपहरों में औषधियाँ बनाने वाली स्त्रियों के साथ समय बिताती थीं। वह गलियारे में अपने पिता की चप्पलों की आहट पहचान सकती थीं। रोमपाद उन्हें प्रजा की फरियादें सुनने के लिए बुलाते, पड़ोसी राजाओं के पत्र पढ़ने को कहते और महल में छोटी-छोटी समस्याएँ लेकर आने वाले लोगों के नाम याद रखने का भरोसा उन्हीं पर करते थे।
वह इसी घर में पली-बढ़ी थीं। वह रोमपाद से प्रेम करती थीं और जानती थीं कि वे भी उनसे बहुत प्रेम करते हैं। उनका विवाह ऋष्यशृंग से हुए कई वर्ष बीत चुके थे।
फिर भी, अयोध्या उनके मन में एक ऐसे कमरे की तरह बसी हुई थी, जिसका दरवाज़ा बंद करना उन्होंने कभी सीखा ही नहीं था।
उन्हें वहाँ के अपने शुरुआती बचपन की बहुत कम बातें याद थीं। चमकते फर्श पर धूप का एक टुकड़ा। एक स्त्री का हाथ, जो उनकी कलाई पर कंगन बाँध रहा था। चंदन की सुगंध से भरा एक कमरा, जहाँ लोग धीमे स्वर में बात कर रहे थे, क्योंकि वहाँ एक बच्ची सो रही थी।
उनकी यादें बिखरी हुई थीं। वह कभी निश्चित नहीं हो पाती थीं कि उनमें से कौन-सी बातें उनकी अपनी स्मृतियाँ थीं और कौन-सी दूसरों से सुनी कहानियों से उनके मन में बनी थीं।
उन्हें अपने जीवन के तथ्य मालूम थे। उनका जन्म महाराज दशरथ और महारानी कौसल्या के यहाँ हुआ था। दशरथ के मित्र राजा रोमपाद ने उन्हें गोद लिया था और अपनी पुत्री की तरह पाला था।
महल में इस व्यवस्था का उल्लेख ऐसे किया जाता था, मानो यह बहुत पहले तय हो चुकी कोई बात हो। लोग उन्हें इसके बारे में बहुत कम बताते थे। जब बताते भी, तो राजाओं के बीच स्नेह, पारिवारिक संबंधों और बेटी पाने के सौभाग्य की बातें करते थे।
किसी ने उन्हें यह नहीं बताया था कि एक बच्चे के लिए अपना एक घर छोड़कर दूसरे घर में बड़ा होना कैसा होता है।
उन्होंने कभी रोमपाद से यह प्रश्न नहीं पूछा था। उन्हें डर था कि ऐसा पूछने पर पिता को लगेगा कि उनका प्रेम शांता के लिए पर्याप्त नहीं था।
अब राम का जन्म हो चुका था और वह सोचने लगी थीं कि अयोध्या के लोग उन्हें उनके परिवार के बारे में क्या बताएँगे।
क्या वे उनका उल्लेख करेंगे?
या उनके बचपन की कहानियाँ उस दिन से शुरू होंगी, जब उन्होंने पहली बार धनुष थामा, जब उन्होंने घुड़सवारी सीखी और जब उनके भाइयों का जन्म हुआ? क्या कोई उन्हें बताएगा कि राम के जन्म से पहले ही उनके माता-पिता की एक पुत्री थी?
शांता ने अपने छोटे भाई के नाम एक पत्र लिखना शुरू किया।
उन्होंने लिखा, प्रिय राम, और फिर रुक गईं।
राम अभी पढ़ नहीं सकते थे। वह बिना सहारे अपना सिर भी नहीं सँभाल सकते थे। उन्होंने कल्पना की कि एक धाय उन्हें पालने से उठा रही है और उनकी नन्ही उँगलियाँ कपड़े का किनारा पकड़ने की कोशिश कर रही हैं।
उन्होंने कागज़ मोड़ा और रख दिया।
कुछ सप्ताह बीत गए। अंग में वर्षा ऋतु आ गई। महल के बगीचे गहरे हरे हो गए और पत्थरों की नालियों में पानी बहने लगा। शांता को अयोध्या के समाचार व्यापारियों, दूसरे राज्यों से आने वाले कुलीन लोगों और कभी-कभार उन लोगों के पत्रों से मिलते रहते थे, जो उन्हें अब भी याद करते थे।
एक दोपहर, राजदरबार में एक संगीतकार शांता के सामने अपनी कला प्रस्तुत करने आया। प्रस्तुति के बाद उसने बताया कि वह कुछ समय पहले अयोध्या में भी कार्यक्रम कर चुका था।
"अयोध्या में?" शांता उत्सुकता से आगे झुकते हुए बोलीं। "आप राजमहल में गए थे?"
"जी, राजकुमारी। मैंने महाराज दशरथ और राजपरिवार के सामने अपनी कला प्रस्तुत की थी। वहाँ युवराज के जन्म का उत्सव अभी भी चल रहा था।"
शांता का चेहरा खिल उठा। "उनके बारे में बताइए। महाराज कैसे हैं? और महारानी कौसल्या? क्या आपने छोटे राजकुमार को देखा?"
"महाराज बहुत प्रसन्न हैं, राजकुमारी। हर ओर उत्सव मनाया जा रहा है। राजकुमार पूरे महल की खुशी हैं।"
"और महारानी?"
"सुना है कि उनका स्वास्थ्य सुधर रहा है।"
शांता कुछ पल रुकीं, फिर उन्होंने पूछा, "क्या महाराज कभी अपनी पुत्री के बारे में बात करते हैं?"
संगीतकार उलझन में पड़ गया। "कौन-सी पुत्री, राजकुमारी?"
शांता ने अपनी दृष्टि झुका दी। "मेरा मतलब..." वह बोलना चाहती थीं, लेकिन शब्द उनके गले में अटक गए।
उन्होंने हल्के से सिर हिलाकर संगीतकार को विदा किया और तेज़ी से गलियारे से होते हुए रोमपाद को खोजने निकल पड़ीं।
उन्हें अपने पिता से एक ऐसी बात पूछनी थी, जिसे पूछने का साहस वह वर्षों से नहीं जुटा पाई थीं।
उन्होंने रोमपाद को उनके अध्ययन-कक्ष में पाया। वे प्रजा की फरियादों से जुड़े पत्रों को छाँट रहे थे। लकड़ी की खिड़कियों के पटों पर वर्षा की बूँदें थपथपा रही थीं। उनकी कोहनी के पास एक दीपक जल रहा था।
"पिताजी, जब आप मुझे अंग लेकर आए थे, तब क्या आपने महाराज दशरथ से कहा था कि वे राजमहल के अभिलेखों में मेरा नाम रहने दें?"
रोमपाद ने पढ़ना रोक दिया।
"हमने तुम्हारे भविष्य के बारे में बात की थी, कि तुम्हारा पालन-पोषण कैसे होगा और यहाँ तुम्हारा जीवन कैसा होगा," उन्होंने कहा।
"मैं जानती हूँ। आपने यह सब किया।"
उन्होंने पत्र एक ओर रख दिया। "आज अचानक यह प्रश्न क्यों?"
"राम का जन्म हो गया है। मैं सोचती रहती हूँ कि उन्हें मेरे बारे में क्या बताया जाएगा।"
रोमपाद अपनी कुर्सी पर पीछे टिक गए। एक पल के लिए शांता को उनकी आँखों के आसपास थकान दिखाई दी। वही थकान, जिसे उन्होंने तब भी देखा था, जब वे फसल से जुड़े विवादों को सुलझाने के लिए देर रात तक काम करते थे।
"मैं तुम्हें यह नहीं बता सकता कि महाराज दशरथ अपने पुत्र से क्या कहेंगे," उन्होंने उत्तर दिया। "लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि तुम्हारे पिता ने तुम्हें मेरे भरोसे सौंपा था और मैंने तुम्हें पूरे हृदय से अपनाया था। इस घर में तुम कभी किसी पर बोझ नहीं रही हो।"
"मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा।"
"तो फिर तुम्हें क्या परेशान कर रहा है?"
शांता ने वर्षा से भीगी खिड़की की ओर देखा। "मैं जानना चाहती हूँ कि क्या उन्हें मेरी याद आती है।"
रोमपाद कुछ देर चुप रहे।
"मुझे लगता है कि आती होगी," उन्होंने अंततः कहा। "लेकिन मैं उनकी ओर से नहीं बोल सकता। मुझे ऐसा दिखावा नहीं करना चाहिए कि मैं जानता हूँ।"
शांता को आश्वासन की उम्मीद थी। उनकी ईमानदारी ने उनके मन में एक गहरी टीस जगा दी, लेकिन साथ ही उन्हें एक ऐसी बात भी दी, जिस पर वह भरोसा कर सकती थीं।
"क्या आपने कभी सोचा था कि मैं वापस जाना चाहूँगी?"
"हाँ।"
"क्या आप चाहते कि मैं चली जाऊँ?"
उन्होंने उनकी आँखों में देखा। "मैं चाहता था कि तुम्हें ऐसा घर मिले, जहाँ तुम्हारा होना सबको प्रिय हो। मुझे उम्मीद थी कि वह घर यहाँ होगा।"
शांता ने मेज़ के पार हाथ बढ़ाकर उनका हाथ छू लिया।
"वह घर यहीं है," उन्होंने कहा।
उन्होंने उनकी उँगलियों को अपने हाथ में थाम लिया।
उस रात शांता ने अपना अधूरा पत्र फिर निकाला।
उन्होंने एक और दीपक जलाया और खुली खिड़की के पास बैठ गईं। वर्षा रुक चुकी थी, लेकिन छत से पानी अब भी नीचे रखे मिट्टी के घड़े में टपक रहा था।
उन्होंने फिर लिखना शुरू किया।
प्रिय राम,
तुम अभी मुझे नहीं जानते। शायद एक दिन तुम मेरा नाम सुनो। तुम्हारा जन्म होने से पहले मेरा जन्म अयोध्या में हमारे पिता दशरथ और हमारी माता कौसल्या के यहाँ हुआ था। अंग के राजा रोमपाद ने मुझे अपनी पुत्री के रूप में पाला है और जहाँ तक मुझे याद है, मैंने उन्हें पिताजी ही कहा है।
वह रुकीं, फिर आगे लिखने लगीं।
मुझे नहीं पता कि तुम्हें मेरे बारे में क्या बताया जाएगा। मैं चाहती हूँ कि तुम जानो कि अंग में मुझे बहुत प्रेम मिला है। मैं यह भी चाहती हूँ कि तुम जानो कि इस स्थान को अपना घर मानने से पहले अयोध्या भी मेरा घर था।
पत्र पर लिखे शब्द उन्हें कुछ अधिक ही साधारण लगे। उन्होंने सोचा था कि अपने भाई को पत्र लिखने से मन में छिपा कोई दुख हल्का हो जाएगा, लेकिन स्याही से लिखे शब्द उन्हें ऐसा कोई सुकून नहीं दे पाए।
उन्होंने शुरू से पत्र पढ़ा।
फिर अंत में एक पंक्ति और जोड़ दी।
जब तुम अपने परिवार के बारे में प्रश्न पूछने योग्य हो जाओ, तो मेरे बारे में भी पूछना।
शांता ने पत्र को सावधानी से मोड़ा।
वह इसे भेज सकती थीं। कोई दूत इसे अयोध्या ले जाता, जहाँ शायद इसे राजा के कागज़ों के बीच रख दिया जाता। संभव था कि महारानी कौसल्या इसे पढ़तीं। शायद दशरथ उस पुत्री की लिखावट पहचान लेते, जो कभी उनके महल में रहा करती थी।
यह भी संभव था कि पत्र किसी सेवक के हाथ लग जाता, जो उसे एक ओर रख देता और फिर वह हमेशा के लिए भुला दिया जाता।
उन्होंने अपनी परिचारिका को बुलाया।
"क्या मैं इसे सुबह जाने वाले दूत के लिए तैयार कर दूँ?" स्त्री ने पूछा।
शांता ने मुहर लगे पत्र को देखा।
"अभी इसे यहीं रहने दो।"
परिचारिका ने पत्र को लकड़ी के एक छोटे संदूक में रख दिया, जिसमें शांता के दूसरे पत्र भी थे। शांता उसे संदूक का ढक्कन बंद करते हुए देखती रहीं।
वर्षों बाद शांता ने राम के बारे में और भी कहानियाँ सुनीं। उनकी शिक्षा, उनका साहस, उनका विवाह और वे घटनाएँ, जो उन्हें अयोध्या से दूर ले गईं, एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुँचती रहीं। लोग उनके भाइयों, उनके माता-पिता और उन सभी लोगों के बारे में बात करते थे, जिन्होंने उनके जीवन को आकार दिया था।
जब भी कोई समाचार आता, शांता उसे ध्यान से सुनतीं।
उन्हें यह जानकर प्रसन्नता होती कि उनके भाई बड़े होकर अपने नाम के योग्य पुरुष बने हैं। कभी-कभी वह सोचतीं कि क्या राम ने कभी उनके बारे में पूछा होगा। उन्हें इसका उत्तर कभी नहीं मिल पाया।
और वह पत्र अंग में ही रह गया।
