संक्षिप्त उत्तर
ताड़का एक शक्तिशाली यक्षिणी थी। वह यक्ष सुकेतु की पुत्री और सुन्द की पत्नी थी। उसके भीतर एक हजार हाथियों के समान बल बताया गया है। सुन्द की मृत्यु के बाद ताड़का ने महर्षि अगस्त्य पर आक्रमण किया। अगस्त्य के शाप से उसका रूप विकृत हो गया और वह नरभक्षी राक्षसी बन गई। उसका पुत्र मारीच भी उसी शाप के कारण राक्षस बन गया।
बाद में ताड़का ने मलद और करूष प्रदेश के आसपास आतंक फैला दिया और ऋषियों के यज्ञ तथा तपस्या में बाधा डालने लगी। महर्षि विश्वामित्र के आदेश पर श्रीराम ने उसका वध किया।
वृत्तांत
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, ताड़का (ताटका) के पिता सुकेतु एक शक्तिशाली यक्ष थे। उन्होंने कठोर तपस्या की थी। भगवान ब्रह्मा उनसे प्रसन्न हुए और उन्हें एक पुत्री प्रदान की, जिसका नाम ताड़का रखा गया। उसे एक हजार हाथियों के समान बल प्राप्त था।
बड़ी होने पर ताड़का का विवाह सुन्द नामक शक्तिशाली पुरुष से हुआ। उनके पुत्र का नाम मारीच था।
बाद में सुन्द का महर्षि अगस्त्य के शाप के कारण अंत हो गया। अपने पति की मृत्यु से क्रोधित ताड़का ने अपने पुत्र मारीच के साथ अगस्त्य पर आक्रमण किया। तब अगस्त्य ने मारीच को राक्षस बनने का शाप दिया और ताड़का को भी उसका सुंदर रूप छोड़कर एक भयंकर, नरभक्षी रूप धारण करने का शाप दिया।
इसके बाद ताड़का मलद और करूष प्रदेश के आसपास रहने लगी और अपने बल तथा मायावी शक्तियों से वहाँ आतंक फैलाने लगी। उसके भय और अत्याचारों के कारण वह क्षेत्र उजड़ गया और आगे चलकर वही वन, ताड़का वन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ऋषियों के यज्ञ तथा धार्मिक अनुष्ठान बाधित होने लगे। विश्वामित्र ने श्रीराम से कहा कि ताड़का के कारण वह क्षेत्र लगभग रहने योग्य नहीं रह गया था।
जब विश्वामित्र ने श्रीराम को ताड़का का वध करने के लिए कहा, तो श्रीराम ने पहले संकोच किया, क्योंकि ताड़का एक स्त्री थी। तब विश्वामित्र ने समझाया कि उसका आचरण अत्यंत विनाशकारी हो चुका है और प्रजा की रक्षा करना क्षत्रिय का धर्म है। दशरथ की आज्ञा के अनुसार विश्वामित्र की बात मानना भी श्रीराम का कर्तव्य था।
ताड़का ने श्रीराम और लक्ष्मण पर आक्रमण किया। उसने धूल का घना बादल उत्पन्न किया और अपनी मायावी शक्ति से पत्थरों की वर्षा करने लगी। राजकुमारों ने पहले उसके शरीर के कुछ अंग काट दिए। इसके बाद ताड़का अदृश्य हो गई और छिपकर उन पर आक्रमण करती रही। तब विश्वामित्र ने श्रीराम से कहा कि सूर्यास्त से पहले युद्ध समाप्त कर देना चाहिए, क्योंकि ऐसी मायावी शक्तियों वाले प्राणियों को रात होने पर परास्त करना अधिक कठिन माना जाता था।
अंततः श्रीराम ने एक शक्तिशाली बाण चलाया, जो ताड़का के वक्षस्थल में लगा और उसका अंत हो गया।
रामचरितमानस में इस प्रसंग को अधिक संक्षिप्त और भक्तिपरक रूप में प्रस्तुत किया गया है। तुलसीदास ताड़का को सुकेतु की पुत्री बताते हैं और श्रीराम द्वारा एक ही बाण से उसके वध का वर्णन करते हैं। उसके वध को भगवान के स्पर्श से निज पद अर्थात् मुक्ति प्राप्त करने के रूप में भी देखा गया है।
क्या आप जानते हैं?
- वाल्मीकि रामायण में ताड़का को जन्म से राक्षसी नहीं, बल्कि यक्षिणी बताया गया है।
- उसका पुत्र मारीच आगे चलकर रामायण की कथा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- वाल्मीकि रामायण में श्रीराम ने ताड़का का तुरंत वध नहीं किया; युद्ध कई चरणों में हुआ।
- रामचरितमानस में ताड़का-वध को अधिक भक्तिपरक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है।
आज के समय में इसका महत्व
ताड़का की कथा केवल एक राक्षसी के वध की कहानी नहीं है। यह श्रीराम के सामने आए एक कठिन नैतिक प्रश्न को भी दिखाती है कि क्या किसी स्त्री के विरुद्ध भी शस्त्र उठाया जा सकता है, यदि उसका आचरण समाज के लिए गंभीर खतरा बन चुका हो?
रामायण इस प्रसंग के माध्यम से यह विचार प्रस्तुत करती है कि कर्तव्य, प्रजा की रक्षा और व्यक्ति के आचरण भी निर्णय के महत्वपूर्ण आधार हैं।
संदर्भ
- वाल्मीकि रामायण
- बालकाण्ड, सर्ग 24-26: ताड़का की उत्पत्ति, उसका शाप, उसके आतंक तथा श्रीराम द्वारा उसके वध का विस्तृत वर्णन।
- रामचरितमानस
- बालकाण्ड, दोहा 208 के आसपास की चौपाइयाँ: ताड़का का परिचय और श्रीराम द्वारा उसके वध का वर्णन।