लेखक का दृष्टिकोण
No Cost EMI इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि वित्त और मार्केटिंग किस प्रकार साथ मिलकर काम करते हैं। जो सुविधा ग्राहक को मुफ्त लगती है, उसके पीछे कई पक्षों का एक सुविचारित व्यावसायिक मॉडल होता है।हालाँकि, No Cost EMI को कभी भी "मुफ़्त पैसा" नहीं समझना चाहिए। यदि आप समय पर EMI का भुगतान नहीं करते, तो विलंब शुल्क, अतिरिक्त ब्याज और आपके क्रेडिट स्कोर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए यह सुविधा तभी लाभदायक है जब इसका उपयोग जिम्मेदारी से किया जाए।
संक्षिप्त परिचय
पहली नज़र में No Cost EMI किसी आकर्षक ऑफ़र की तरह लगती है। आज सामान खरीदिए, कई महीनों में भुगतान कीजिए और कोई ब्याज भी नहीं दीजिए। लेकिन वास्तविकता थोड़ी अलग है। अधिकांश मामलों में ब्याज समाप्त नहीं होता, बल्कि उसका भुगतान कोई और करता है, जैसे कि विक्रेता, उत्पाद बनाने वाली कंपनी (ब्रांड) या किसी विशेष प्रचार योजना के तहत स्वयं व्यापारी।
यह कैसे काम करती है?
मान लीजिए आप ₹60,000 का एक मोबाइल फोन खरीदते हैं और उसे छह महीने की No Cost EMI पर लेते हैं।
यदि यही खरीद सामान्य EMI पर होती, तो बैंक आपसे ब्याज वसूलता। लेकिन No Cost EMI में अक्सर विक्रेता या ब्रांड वही ब्याज बैंक को स्वयं चुका देता है। इसलिए आपको केवल उत्पाद की घोषित कीमत ही मासिक किश्तों में चुकानी पड़ती है।
अब सवाल यह है कि कोई विक्रेता ऐसा क्यों करेगा?
क्योंकि उसके लिए आज एक उत्पाद बेचना, उस ग्राहक का इंतज़ार करने से अधिक लाभदायक होता है जो शायद बाद में खरीदारी ही न करे। महंगे उत्पादों को आसान मासिक किश्तों में उपलब्ध कराकर कंपनियाँ अधिक ग्राहकों को आकर्षित करती हैं और अपनी बिक्री बढ़ाती हैं।
बैंकों को भी इससे लाभ होता है। हर क्रेडिट कार्ड लेन-देन पर व्यापारी बैंक को एक शुल्क देता है, जिसे Merchant Discount Rate (MDR)कहा जाता है। इसके अलावा, ग्राहक भविष्य में भी उसी क्रेडिट कार्ड का उपयोग अन्य खरीदारी के लिए करते रहते हैं, जिससे बैंक और ग्राहक के बीच संबंध मजबूत होता है।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हर No Cost EMI एक जैसी नहीं होती। कुछ मामलों में बैंक ब्याज वसूलता है, लेकिन विक्रेता पहले से उतनी ही राशि की छूट (Discount) दे देता है, जिससे ग्राहक पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ता। वहीं कुछ योजनाओं में ब्रांड या व्यापारी सीधे बैंक को ब्याज का भुगतान करता है। इसलिए किसी भी ऑफ़र का लाभ लेने से पहले उसकी शर्तें अवश्य पढ़नी चाहिए।
एक वास्तविक उदाहरण
मान लीजिए आप ₹90,000 का एक लैपटॉप खरीदना चाहते हैं।
यदि आप पूरी राशि एक साथ चुकाते हैं, तो आपके मासिक बजट पर दबाव पड़ सकता है। लेकिन No Cost EMI के माध्यम से आप उसी कीमत को कई छोटी-छोटी मासिक किश्तों में चुका सकते हैं, बिना घोषित कीमत बढ़े।
इसे ऐसे समझिए जैसे कोई रेस्टोरेंट भोजन के साथ मुफ़्त मिठाई देता है। मिठाई वास्तव में पूरी तरह मुफ्त नहीं होती। उसकी लागत पहले से ही रेस्टोरेंट की कीमत या उसके मार्केटिंग बजट में शामिल होती है, क्योंकि अधिक ग्राहकों को आकर्षित करना उसके लिए अधिक लाभदायक होता है।
ठीक उसी प्रकार, No Cost EMI भी अक्सर ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए बनाई गई एक मार्केटिंग रणनीति होती है, न कि पूरी तरह मुफ्त वित्तीय सुविधा।
इसका महत्व
No Cost EMI ने आधुनिक भारत में उपभोक्ता खर्च को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसकी मदद से लोग स्मार्टफोन, लैपटॉप, घरेलू उपकरण, फर्नीचर और अन्य महंगे उत्पाद बिना एकमुश्त बड़ी राशि चुकाए खरीद सकते हैं।
ग्राहकों के लिए यह सुविधा नकदी के बेहतर प्रबंधन (Cash Flow) में मदद करती है। व्यवसायों के लिए यह बिक्री और औसत ऑर्डर मूल्य बढ़ाती है। वहीं बैंकों के लिए यह क्रेडिट कार्ड के उपयोग को बढ़ावा देती है और ग्राहकों के साथ उनके संबंध मजबूत करती है।